विशेष संवाददाता | जन आवाज
बांकी मोगरा शहर/क्षेत्र: जरा सी हवा क्या चली और बादलों ने थोड़ी गड़गड़ाहट क्या दिखाई, बिजली विभाग की तथाकथित ‘विश्वस्तरीय व्यवस्था’ का ढोल ढोल की तरह बज गया। मामूली मौसम बिगड़ते ही पूरी रात पूरा इलाका अंधेरे के आगोश में डूब गया। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है, असली खेल तो इस अंधेरे के पीछे चल रहा है—जहाँ अधिकारी एसी कमरों में सो रहे हैं, कर्मचारी नशे में झूम रहे हैं और जनता बूंद-बूंद पानी व सांस-सांस बिजली के लिए तरस रही है।
बिल वसूलने में शेर, सुविधा देने में ढेर!
बिजली विभाग का नियम कानून जनता के लिए किसी तानाशाही से कम नहीं है। अगर कोई आम उपभोक्ता अपना बिजली बिल भरने में एक दिन भी लेट कर दे, तो उस पर भारी भरकम लेट फाइन (पेनाल्टी) थमा दिया जाता है। पैसे वसूलने में विभाग की फुर्ती किसी चीते जैसी होती है, लेकिन जब 24 घंटे बिजली देने की बात आती है, तो यह कछुए की चाल से भी बदतर साबित होता है।
सवाल यह है: जब देर से बिल देने पर जनता से जुर्माना वसूला जाता है, तो पूरी रात बिजली गायब रखने के लिए क्या विद्युत विभाग जनता को हर्जाना देगा?
हुकिंग वालों से ‘मंथली सेटिंग’, ईमानदार उपभोक्ता परेशान
विभाग में ऊपर से लेकर नीचे तक कटमनी और अवैध वसूली का खेल सरेआम चल रहा है।
कटियाबाज़ों पर मेहरबानी: जो लोग धड़ल्ले से अवैध कटिया (हुकिंग) डालकर बिजली चोरी कर रहे हैं, उनसे क्षेत्रीय कर्मचारियों और अधिकारियों का ‘मंथली हफ्ता’ फिक्स है। समय पर अवैध वसूली की रकम जेब में पहुंचते ही विभाग आँखें मूँद लेता है।
ईमानदार उपभोक्ता पर चाबुक: जो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार ईमानदारी से मीटर लगवाकर हर महीने भारी बिल भरते हैं, उन्हें बदले में सिर्फ अंधेरा और लो-वोल्टेज की मार झेलनी पड़ती है।
शाम ढलते ही जाम छलकते हैं: कर्मचारी नशे में धुत, अधिकारी नदारद
विभाग की लापरवाही की हद तो तब हो जाती है जब शाम होते ही क्षेत्रीय फॉल्ट सेंटर 'मयखाने' में तब्दील हो जाते हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि शाम ढलते ही निचले स्तर के कर्मचारी शराब के नशे में धुत हो जाते हैं।
जब बिजली जाने पर परेशान जनता शिकायत केंद्र पर फोन मिलाती है, तो या तो फोन रिसीव नहीं होता या फिर कर्मचारी साफ शब्दों में हाथ खड़े कर देते हैं—
"कोई जवाबदार बड़ा अधिकारी मौके पर नहीं है, जब साहब लोग ही गायब हैं तो हम क्या करें?"
ऊपर से नीचे तक एसी कमरों में खर्राटे मार रहे जिम्मेदार अधिकारियों का फोन पूरी रात 'नॉट रीचेबल' या 'बिजी' आता रहता है। जनता रात भर अधिकारियों की चौखट पर माथा पटकती रहती है, लेकिन किसी साहब की नींद खराब नहीं होती।
बूढ़ों और मरीजों पर आफत, कब जागेगा सोता हुआ विभाग?
इस अमानवीय रवैये का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि भीषण गर्मी और उमस भरे अंधेरे में गंभीर मरीज, बुजुर्ग और छोटे मासूम बच्चे तड़पने को मजबूर हैं।
अस्थमा और सांस के मरीजों के ऑक्सीजन कंसंट्रेटर बंद पड़ जाते हैं।
बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ रही है और छोटे बच्चे रात भर रोते-बिलखते रहते हैं।
इन्वर्टर और यूपीएस भी पूरी रात की कटौती के आगे दम तोड़ चुके हैं।
लेकिन विभाग के आला अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
बड़ा सवाल:
क्या विद्युत विभाग केवल बिल और फाइन वसूलने की मशीन बन चुका है? क्या जनता के टैक्स और बिल के पैसों से ऐश करने वाले उच्च अधिकारियों पर कोई सख्त कार्रवाई होगी या फिर यह पूरा महकमा इसी तरह भ्रष्टाचार और लापरवाही की गहरी नींद सोता रहेगा?
अगर जल्द ही व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ और भ्रष्ट कर्मचारियों पर गाज नहीं गिरी, तो जनाक्रोश का ऐसा गुबार फूटेगा जिसकी गूंज शासन के उच्च गलियारों तक सुनाई देगी!

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